रिपोर्ट – हरीश

हमीरपुर। माहे मुबारक रमज़ान का तीसरा अशरा (जहन्नम से निजात का दौर) शुरू होते ही क्षेत्र की मस्जिदों में इबादत का माहौल और भी रूहानी हो गया है। रोज़ेदार अल्लाह की रज़ा हासिल करने के लिए मस्जिदों में एतिकाफ में बैठकर लगातार इबादत, तिलावत-ए-कुरआन, ज़िक्र व दुआओं में मशगूल हो गए हैं।
मौलाना रियाजुल हसन ने बताया कि इस्लामी परंपरा के अनुसार रमज़ान के आख़िरी दस दिनों में एतिकाफ बैठना सुन्नत-ए-मुअक्कदा माना गया है। हदीस शरीफ़ में आता है कि हज़रत आयशा (रज़ि.) से रिवायत है कि नबी-ए-करीम (सल्ल.) रमज़ान के आख़िरी दस दिनों में एतिकाफ फ़रमाया करते थे। इसी सुन्नत पर अमल करते हुए क्षेत्र की कई मस्जिदों में रोज़ेदार दुनिया से किनारा कर अल्लाह की याद में मशगूल हो गए हैं।
उलेमा बताते हैं कि एतिकाफ का असल मक़सद इंसान का अपने रब से खास रिश्ता जोड़ना और अपने गुनाहों से तौबा करना है। इस दौरान मुसलमान खास तौर पर लैलतुल क़द्र की तलाश करते हैं, जिसके बारे में कुरआन में बताया गया है कि यह रात हजार महीनों से बेहतर है।
तीसरे अशरे के आगाज़ के साथ ही मस्जिदों में नमाज़, तिलावत और दुआओं का सिलसिला बढ़ गया है। रोज़ेदार अल्लाह से मग़फ़िरत, रहमत और जहन्नम से निजात की दुआ करते हुए पूरी अकीदत के साथ इबादत में लगे हुए हैं।

