रिपोर्ट – रजनीश शर्मा

हरदोई। यह एक गंभीर जमीनी हकीकत है, जो कागजी दावों और वास्तविक स्थिति के बीच के अंतर को उजागर करती है। हरदोई जैसे महत्वपूर्ण जिले में, जो उपमुख्यमंत्री का गृह जनपद भी है, वहां की ऐसी स्थिति स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गहरा सवाल खड़ा करती है।
“ये तस्वीरें किसी परित्यक्त खंडहर की नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में स्थित जमुरा उप स्वास्थ्य केंद्र की हैं। यह वही जिला है, जिसकी जिम्मेदारी खुद प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री संभालते हैं, लेकिन यहां के ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र खुद ‘बीमार’ पड़े हैं।”
“जरा गौर से देखिए इन बंद दरवाजों और झाड़-झंखाड़ को। परिसर में पसरा सन्नाटा चीख-चीख कर कह रहा है कि यहाँ महीनों से किसी डॉक्टर या मरीज के कदम नहीं पड़े। बिजली गायब है, शौचालय का टैंक खुला पड़ा है और चारों तरफ गंदगी का साम्राज्य है।”
“हैरानी की बात तो यह है कि कागजों पर सब ‘चंगा’ है। टोडरपुर PHC प्रभारी एम.पी. जायसवाल दावा करते हैं कि केंद्र रोज खुलता है और दवाइयां बंटती हैं। लेकिन हकीकत? हकीकत गेट पर लटका ये जंग लगा ताला बयां कर रहा है।
दूरभाष– से वहीं CMO साहब का कहना है कि अभी हैंडओवर की प्रक्रिया ही फंसी है।”
“ग्रामीणों का दर्द सिस्टम की फाइलों में कहीं दब गया है। इलाज के लिए इन्हें मीलों दूर भटकना पड़ता है। सवाल ये है कि जब ड्यूटी लगाई गई है, तो डॉक्टर साहब कहाँ गायब हैं?”
पिछली बार जब मुद्दा उठा, तो दिखावे की सफाई हुई। पर समाधान? वो आज भी नदारद है। क्या जमुरा के लोगों को कभी उनके हक का इलाज मिलेगा या फिर ये उपकेंद्र सिर्फ कागजों पर ही चलता रहेगा?

