रिपोर्ट – संदीप वर्मा
बाराबंकी। बाराबंकी में ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसीम राईन ने चुनावी व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर विपक्ष की ओर से लगाए जा रहे आरोपों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सवाल उठाना और संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर चर्चा करना राजनीतिक दलों का अधिकार है, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं पर गंभीर आरोप लगाते समय तथ्य, प्रमाण और संवैधानिक प्रक्रिया का ध्यान रखा जाना चाहिए। बिना ठोस प्रमाण के लगाए जाने वाले आरोप लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति आम जनता के विश्वास को प्रभावित कर सकते हैं।
वसीम राईन ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनता की लोकतांत्रिक भागीदारी और जनादेश को अभिव्यक्त करने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। निर्वाचन आयोग भारत की एक स्थायी संवैधानिक संस्था है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत संसद, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी दी गई है।
उन्होंने भारत के पहले आम चुनाव का उल्लेख करते हुए कहा कि आजादी के बाद देश के सामने इतने बड़े लोकतांत्रिक अभ्यास को संचालित करना अपने आप में ऐतिहासिक चुनौती थी। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, पहले आम चुनाव अक्टूबर 1951 से मार्च 1952 के बीच हुए। उस समय जम्मू-कश्मीर को छोड़कर 17,32,12,343 मतदाता पंजीकृत थे। पहली लोकसभा में 489 सदस्य थे और उसका गठन 2 अप्रैल 1952 को हुआ। चुनाव प्रक्रिया चार महीने और 68 मतदान दिवसों में पूरी हुई थी।
राईन ने कहा कि उस समय मतदाता सूची तैयार करने से लेकर मतदान केंद्रों की स्थापना, मतपत्रों की छपाई, मतदान कर्मियों की व्यवस्था और देश के दूर-दराज क्षेत्रों तक चुनाव सामग्री पहुंचाने जैसी बड़ी चुनौतियां थीं। इसके बावजूद देश ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थापित किया। उन्होंने कहा कि यह भारतीय जनता की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता का महत्वपूर्ण प्रमाण है।
उन्होंने कहा कि पिछले सात दशकों में भारतीय चुनाव व्यवस्था में व्यापक बदलाव हुए हैं। मतदाता सूची के नियमित अद्यतन, मतदाता पहचान पत्र, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन, वीवीपैट, तकनीकी व्यवस्थाओं और मतदाता जागरूकता अभियानों ने चुनाव प्रक्रिया को लगातार विकसित किया है। निर्वाचन आयोग की आधिकारिक जानकारी में 1951 से लेकर वर्तमान दौर तक लोकसभा चुनावों का विस्तृत इतिहास और चुनावी आंकड़े उपलब्ध हैं।
वसीम राईन ने कहा कि समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों और नेताओं की ओर से निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल को अपनी शिकायत लोकतांत्रिक और कानूनी माध्यम से रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन चुनाव प्रक्रिया पर लगाए गए आरोपों की विश्वसनीयता प्रमाण और दस्तावेजों के आधार पर ही परखी जानी चाहिए। यदि किसी राजनीतिक दल या नागरिक के पास चुनावी अनियमितता से संबंधित ठोस शिकायत है तो उसे संबंधित संवैधानिक एवं कानूनी मंच पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि चुनाव परिणाम किसी भी दल या उम्मीदवार के पक्ष में हों, लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनादेश का सम्मान महत्वपूर्ण है। इसी के साथ चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और शिकायतों के उचित निस्तारण की व्यवस्था भी लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है।
राईन ने कहा कि वर्तमान समय में निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारियां पहले की अपेक्षा कहीं अधिक व्यापक हैं। निर्वाचन आयोग की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में कार्यभार संभाला था।
उन्होंने राजनीतिक दलों से अपील करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर जनता के बीच तथ्यात्मक और जिम्मेदार संवाद होना चाहिए। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और जनता के विश्वास को बनाए रखना सभी राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है।
वसीम राईन ने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक यात्रा अनेक चुनौतियों के बावजूद लगातार आगे बढ़ी है। चुनाव व्यवस्था में सुधार और पारदर्शिता को लेकर चर्चा लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन आरोपों और राजनीतिक बहस के बीच तथ्य तथा संवैधानिक प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि मजबूत लोकतंत्र के लिए मतदाता का विश्वास, संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और जनादेश का सम्मान समान रूप से आवश्यक है।
