रिपोर्ट – संदीप वर्मा
बाराबंकी। घाघरा नदी उस दिन नदी कम और एक बेचैन सवाल ज्यादा लग रही थी। पानी दूर तक फैला था। खेतों की मेड़ें दिखाई नहीं देती थीं। जिन रास्तों पर कल तक बच्चे दौड़ते थे, वहां अब पानी का सन्नाटा था। कहीं घर कटान की जद में थे, कहीं सामान गठरियों में बंधा था और कहीं बंधे पर अस्थायी जिंदगी बस गई थी।
ऐसे समय में जब बाढ़ पीड़ितों को भाषण नहीं, कंधे और सहारे की जरूरत थी, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री अरविंद कुमार सिंह गोप रामनगर विधानसभा क्षेत्र के ग्राम हेतमपुर पहुंच गए।
न कोई बड़ा मंच, न स्वागत का तामझाम।
सामने बाढ़ थी, कटान थी और उन लोगों की आंखें थीं, जिनकी जिंदगी घाघरा की धारा ने एक झटके में उलट-पुलट दी थी।
गोप ने सबसे पहले उन परिवारों के बीच जाना जरूरी समझा, जिनके घर कटान की भेंट चढ़ चुके हैं। उन्होंने पीड़ित परिवारों के बीच बैठकर उनकी बातें सुनीं। किसी ने मकान की चिंता बताई, किसी ने जमीन की, किसी ने पशुओं की और किसी ने फसल के बर्बाद हो जाने का दर्द सुनाया।
एक वृद्ध सामने आया तो गोप ने उसे सहारा दिया।
तस्वीर में वह दृश्य किसी राजनीतिक कार्यक्रम का नहीं, बल्कि एक इंसान के दूसरे इंसान के साथ खड़े होने का दृश्य दिखाई देता है।
एक तरफ घाघरा की उफनती धारा थी, दूसरी तरफ बेघर लोगों की मजबूरी।
गोप ने कटान प्रभावित क्षेत्र का मौके पर निरीक्षण किया और अधिकारियों-कर्मचारयों से राहत एवं बचाव के लिए किए जा रहे इंतजामों की जानकारी ली। उन्होंने उच्च अधिकारियों से दूरभाष पर बातचीत कर स्पष्ट कहा कि बाढ़ से प्रभावित प्रत्येक जरूरतमंद परिवार तक उसकी आवश्यकता के अनुसार राहत सामग्री पहुंचनी चाहिए।
इसके बाद राहत सामग्री का वितरण शुरू हुआ।
किसी महिला के हाथ में राशन का सामान पहुंचा तो उसके चेहरे पर कुछ पल के लिए चिंता की लकीरें हल्की हुईं। किसी परिवार को जरूरी सामग्री मिली तो लगा जैसे विपत्ति के बीच किसी ने दरवाजे पर दस्तक देकर कहा हो—“तुम अकेले नहीं हो।”
यही इस दौरे की सबसे बड़ी तस्वीर थी।
न पद का अहंकार, न राजनीति की दूरी
प्रेमचंद की कहानियों के किसान की तरह यहां भी आदमी की सबसे बड़ी पूंजी उसकी मेहनत थी। लेकिन बाढ़ ने वही मेहनत पानी में बहा दी थी।
किसी ने वर्षों लगाकर घर बनाया था।
किसी ने खेत में फसल खड़ी की थी।
किसी ने पशुओं को परिवार के सदस्य की तरह पाला था।
अब सामने सिर्फ पानी था।
गोप ने बाढ़ पीड़ितों से कहा कि मकान, जमीन, पशु और फसल के नुकसान की जानकारी ली जा रही है और जरूरतमंदों को यथासंभव सहायता उपलब्ध कराने के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा। उन्होंने पार्टी पदाधिकारियों को भी निर्देशित किया कि वे बाढ़ पीड़ित परिवारों के बीच लगातार बने रहें और जहां सरकारी मदद की जरूरत हो, वहां आवाज उठाने के साथ अपनी ओर से भी हरसंभव सहायता करें।
इस दौरान उन्होंने बाबा नारायण दास जी के श्रीचरणों में प्रणाम कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
बंधे पर अस्थायी निवास बना रहे लोगों के बीच पहुंचकर उन्होंने उनकी जरूरतें भी जानीं। वहां कोई अपना घर छोड़कर बैठा था, कोई खेत छोड़कर, कोई पशुओं की चिंता में था और कोई इस इंतजार में कि पानी कब उतरेगा और वह फिर अपनी मिट्टी पर लौट सकेगा।
घाघरा के किनारे खड़ा एक सवाल
घाघरा की धारा को देखते हुए गोप का वहां खड़ा होना तस्वीर में बहुत कुछ कहता है।
वह उंगली से उस तरफ इशारा कर रहे हैं, जहां पानी अपने साथ खेत, मिट्टी और लोगों की उम्मीदों को काटता हुआ आगे बढ़ रहा है।
यह तस्वीर शायद किसी भाषण से ज्यादा प्रभावशाली है।
क्योंकि राजनीति में पद मिलते हैं और चले जाते हैं।
कुर्सियां आती हैं और चली जाती हैं।
लेकिन मुसीबत में किसी के घर तक पहुंचने वाला हाथ और उसके दुख में खड़े होने वाला कंधा याद रह जाता है।
सत्ता की ठसक को ठोकर मारकर, इंसानियत की तरफ कदम बढ़ाने की यही तस्वीर हेतमपुर से सामने आई है।
पूर्व विधायक रामगोपाल रावत, प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य सुरेश चंद्र गौतम, जिला मीडिया प्रभारी वीरेंद्र प्रधान, जिला सचिव अतीक चौधरी सहित रामवीर सिंह यादव, शेखर पाल, शिवेंद्र सिंह, प्रभात सिंह, अनिल यादव, प्रधान अतुल सिंह, सानू सिंह राठौड़, नंदलाल गौतम, अखंड प्रताप सिंह, प्रभात शुक्ला, रामकृपाल यादव, राजेश वर्मा, अर्चित यादव, सरोज वर्मा, शिवकुमार गौतम, संजय चौहान, मयाराम यादव, ज्ञान चौहान, अशर्फी लाल यादव, इस्लामुद्दीन, मोहम्मद इश्तियाक, मोहम्मद असलम, छंगा प्रधान सहित अन्य लोगों ने भी बाढ़ पीड़ितों के बीच राहत सामग्री वितरित की।
घाघरा अभी भी बह रही है।
कटान अभी भी जारी है।
लेकिन हेतमपुर की इन तस्वीरों में एक चीज साफ दिखाई देती है—
मुसीबत के समय इंसानियत अगर किसी के दरवाजे तक पहुंच जाए, तो उम्मीद पूरी तरह नहीं मरती।
“राजनीति का असली अर्थ शायद यही है—कुर्सी पर बैठना नहीं, जरूरत के वक्त किसी के साथ खड़ा होना।”
