घर से बरामद वृद्धा का क्षत-विक्षत शव, चांचल्य क्षेत्र में सनसनी

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रिपोर्ट सुभाष मंडल/ मुर्शिदाबाद/पश्चिम बंगाल

नदिया के नबद्वीप में मां को लगाया चूहेदानी जैसे कमरे में, बेटों ने बड़े पक्के घर में रहते हुए भी मां को किया उपेक्षित।
नदिया जिले के नबद्वीप पौरसभा क्षेत्र के 24 नं वार्ड, प्रफुल्लनगर कॉलोनी में एक दिल दहला देने वाली घटना ने इलाके को हिलाकर रख दिया। तीन बेटों के बड़े पक्के घर में रहने के बावजूद 78 वर्षीय मिनती बनिक को मात्र ढाई फुट चौड़े और चार फुट लंबे बिन दरवाजे वाले चिलेकोठरी जैसे संकरे कमरे में ठहराया गया था।
कई वर्षों से इसी छोटे से कमरे में अस्वस्थ अवस्था में रह रही थीं वे।बुजुर्ग महिला के बड़े बेटे के अनुसार, छोटे भाई ने अचानक सुबह खबर दी कि उस छोटे कमरे में कुत्ता मां के मुंह को चाट-चबा रहा है। इसके बाद उन्होंने शीघ्रता से कुत्ते को भगाया और मां के क्षत-विक्षत मुंह पर रुई रखी। फिर डॉक्टर को सूचना दी गई, जिन्होंने मृत घोषित कर दिया।
बाद में नबद्वीप थाने की पुलिस घटनास्थल पर पहुंची। अब उठ रहे हैं गंभीर सवाल: मां को क्यों ऐसी उपेक्षा? क्या इलाके के बच्चे सुरक्षित?इस घटना से कई सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर मां को इतनी उपेक्षा का शिकार क्यों बनना पड़ा? अगर एक कुत्ता इस तरह किसी वृद्ध को चबा सकता है, तो क्षेत्र के छोटे-छोटे बच्चों की सुरक्षा का क्या होगा?
देश में ऐसी घटनाएं बार-बार घटी हैं। कई बार बेटे विदेश में रहते हैं और घर में मां-बाप का सड़ा शव पड़ा मिलता है। कुछ लोग इसे सामाजिक क्षति या विघटन कहेंगे। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा ही है? क्या ये घटनाएं यह सिद्ध नहीं करतीं कि देश में धीरे-धीरे धर्म के अवक्षय के कारण ही ऐसी दुखद और पीड़ादायक घटनाएं सामने आ रही हैं?
शिक्षा व्यवस्था में नैतिकता का अभाव, सनातन शास्त्रों की उपेक्षा उपरोक्त घटना का सटीक विश्लेषण करें तो स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा क्षेत्र में नैतिक शिक्षा का पूर्णतः अभाव है। सनातन शास्त्रों की शिक्षा का लोप हो गया है, जिसके फलस्वरूप देश के विभिन्न स्थानों पर भारतीय संस्कृति के विरुद्ध आचरण देखने को मिल रहा है।श्रीभगवद्गीता का अमर संदेश विश्व का सर्वश्रेष्ठ शास्त्र ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता कहती हैं:…

“नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य नचायुक्तस्य भावना।
नचाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥
अर्थात्—जो व्यक्ति आत्मा से युक्त नहीं, उसकी बुद्धि कार्यरत नहीं होती। युक्त न होने पर न आत्मभावना होती है, न चिन्तन। चिन्तनरहित व्यक्ति को शान्ति कैसे मिलेगी? शान्तिरहित व्यक्ति को सुख कहां से प्राप्त होगा?
मैकाले शिक्षा नीति का कुप्रभाव स्वतंत्रता के बाद नेहरू द्वारा मैकाले की अंग्रेजीप्रधान शिक्षा व्यवस्था अपनाने से सामान्य विद्यालयों से धार्मिक शिक्षा विलुप्त हो गई। आज हमारे देश की साधारण विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक आत्मभाव रहित विद्या कि स्वरूप है… लेकिन देश के बड़े-बड़े नेता अपने संतान-सन्ततियों को कन्वेंट स्कूलों में भेजकर भारतीय संस्कृति के विरुद्ध ईसाई धर्म आधारित शिक्षा दिलाते हैं, जिससे शिक्षा व्यवस्था का मूलगत संहार हो गया। परंतु इसका समाधान क्या है !
समाधान-धार्मिक शिक्षा की तत्काल व्यवस्था आवश्यकयदि देशवासियों को ऐसी घटनाओं का दर्शन फिर न करना पड़े, तो प्रत्येक राज्य और केंद्र सरकार को तुरंत वास्तविक उदाहरण देकर धार्मिक—शास्त्रीय शिक्षा की व्यवस्था करनी होगी। जितनी शीघ्र यह होगा, उतनी ही शीघ्र भारतवर्ष का मंगल होगा। अन्यथा विश्वगुरु बनने के पथ में ये घटनाएं अवरोध बनकर खड़ी हो जाएंगी—इसमें कोई संदेह नहीं।

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