रिपोर्ट: कबीर
मुजफ्फरनगर। रासायनिक खेती से होने वाले मृदा एवं जल प्रदूषण को कम करने और किसानों को टिकाऊ कृषि पद्धतियों से जोड़ने के उद्देश्य से सोमवार को विकास भवन सभागार में प्राकृतिक खेती विषयक कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम राज्य स्वच्छ गंगा मिशन के अंतर्गत नमामि गंगे योजना एवं कृषि विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हुआ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता मुख्य विकास अधिकारी कमल किशोर देशभूषण कंडारकर ने की, जबकि उप कृषि निदेशक प्रमोद सिरोही के मार्गदर्शन में कार्यशाला संपन्न हुई। कार्यशाला में जानसठ, मोरना और पुरकाजी विकासखंड के प्राकृतिक खेती से जुड़े कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन (सीआरपी), प्रगतिशील किसानों और स्थानीय कृषकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
विशेषज्ञों ने किसानों को प्राकृतिक खेती के लाभ, कम लागत में अधिक उत्पादन तथा आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी दी। प्रभारी अधिकारी डॉ. जे.पी. शर्मा ने जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र एवं अग्निअस्त्र जैसे प्राकृतिक उत्पादों की तैयारी और उनके उपयोग की विधियों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
गन्ना शोध केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. वेद प्रकाश, डॉ. अजय कुमार सिंह एवं डॉ. जे.पी. सिंह ने किसानों को गन्ना उत्पादन बढ़ाने, जैविक कीटनाशकों और प्राकृतिक फफूंदीनाशकों के उपयोग के साथ प्राकृतिक खेती के माध्यम से बेहतर पैदावार प्राप्त करने के उपाय बताए। वहीं कृषि विज्ञान केंद्र चितौड़ा की वैज्ञानिक डॉ. पूजा ने प्राकृतिक खेती से तैयार गन्ना एवं गेहूं की फसलों के सकारात्मक परिणामों को साझा किया।
मुख्य विकास अधिकारी ने किसानों से रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग को कम कर प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती से विषमुक्त खाद्यान्न उत्पादन के साथ मिट्टी की उर्वरता, जल संरक्षण और पर्यावरण संतुलन को भी बढ़ावा मिलेगा। उप कृषि निदेशक प्रमोद सिरोही ने किसानों को विभागीय योजनाओं की जानकारी देते हुए प्राकृतिक खेती को जनआंदोलन का रूप देने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के समापन पर वित्तीय वर्ष 2025-26 में प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले प्रगतिशील किसानों को प्रमाण पत्र एवं शॉल भेंट कर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर कृषि विभाग के अधिकारी, वैज्ञानिक, कर्मचारी तथा बड़ी संख्या में किसान उपस्थित रहे।
