रिपोर्ट – अनिल कुमार

फतेहपुर। जनपद में मीट/मांस कारोबार को लेकर खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की आरटीआई से जो तस्वीर सामने आई है, वह प्रशासनिक दावों की पोल खोलने वाली है। मा० उत्तर प्रदेश सूचना आयोग, लखनऊ के नोटिस के अनुपालन में दी गई जानकारी से स्पष्ट है कि जिले में एक ओर 62 मीट शॉप वैध रूप से पंजीकृत हैं, तो दूसरी ओर 18 दुकानें वर्षों से बिना लाइसेंस धड़ल्ले से संचालित होती रहीं, जिन पर कार्रवाई अब भी अधूरी और आधी-अधूरी दिखाई देती है।
आरटीआई के जवाब में विभाग ने स्वीकार किया है कि जिले में सिमौर, गाजीपुर, करमचन्द्रपुर सांडा, कोराई, पिलखिनी हुसैनगंज, मौहारी, बहुआ, ललौली, खखरेरू, हथगांव, अमौली, जहानाबाद, बिंदकी, आबूनगर, बाकरगंज, पनी, सैय्यदवाड़ा और फतेहपुर शहर जैसे इलाकों में कुल 62 मीट दुकानें पंजीकृत हैं। इनमें इरफान कुरैशी, मोहम्मद मुस्तकीम, अजीत कुमार, चाँद बाबू, कामिल अली, नफीस कुरैशी, गुल्फकार, सैम अहमद, मो० फहीम अंसारी, गुलाम हैदर, वसीम, सेराज, तनवीर आलम, अकबर, मो० शाहरूख, नूरुल हसन, आरिफ, अनवरूल हसन, नियाज अहमद, शिव प्रकाश, मो० जिलानी, मासूक अली, खुर्शीद, इस्माइल कुरैशी, मो० समीर, मुकीम अहमद, वसीम खान, रफी अहमद, हनीफ, मो० शेरू कुरैशी, दिलशाद अहमद, फैजान, अशोक कुमार, मो० रईस, मो० हसीब, मो० नदीम, इरशाद, आसिफ, साहब वारिस, जुनैद अहमद, रेहान, शहनवाज, मुफीद, मो० सईद, महफूज अली और सलमान जैसे नाम शामिल हैं। विभाग का दावा है कि ये सभी दुकानें खाद्य सुरक्षा विभाग से पंजीकृत हैं।
इसके उलट, आरटीआई में यह भी दर्ज है कि 18 मीट शॉप बिना किसी वैध पंजीकरण के संचालित पाई गईं। इनमें आबूनगर के जामा मस्जिद के पास मोहम्मद सैफी, लाला बाजार फतेहपुर के वसीम खान, सरांय जीटी रोड के इमरान, चौफेरवा लखनऊ रोड के अंसार, गुडियानी मोड़ के निसार अहमद, शादीपुर के अंसार अहमद, बाकरगंज बकरमंडी के मो० राशिद, पक्का तालाब रोड के रिजवान, बाकरगंज के फैजान और मुफीद, कछौरा जहानाबाद के नफीस, जहानपुर बिंदकी के सरफराज, अमौली और कजियाना बिंदकी क्षेत्र के कई नाम, साईं ढाबा के पास बकेवर के इरफान, देवमई के अनस और घाटमपुर रोड बकेवर के सईद शामिल हैं।
इन अवैध दुकानों पर कार्रवाई के नाम पर विभाग ने केवल इतना बताया कि 18 मामलों में न्यायालय में वाद दायर किए गए, जिनमें से मात्र 4 मामलों का निस्तारण हो सका और कुल 1 लाख 90 हजार रुपये का अर्थदंड लगाया गया। शेष अधिकांश मामले आज भी न्यायालय में लंबित हैं। सवाल यह है कि जिन दुकानों को बिना लाइसेंस पकड़ा गया, वे कार्रवाई के बाद भी किसके संरक्षण में चलती रहीं और जनस्वास्थ्य से जुड़े इस गंभीर मामले में ठोस बंदी क्यों नहीं हुई।
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि आरटीआई के उत्तर में विभाग ने साफ लिखा है कि नगर पंचायत, पुलिस और खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा कोई संयुक्त या विशेष जांच अभियान चलाया ही नहीं गया। यानी अवैध मीट दुकानों पर कार्रवाई न तो नियमित थी और न ही समन्वित। यह स्थिति सीधे तौर पर विभागीय लापरवाही और ढीली निगरानी की ओर इशारा करती है।
जनपद में खुलेआम अवैध मीट शॉप का संचालन, नामजद दुकानों के बावजूद लंबित कार्रवाई और संयुक्त अभियान का अभाव यह सवाल खड़ा करता है कि क्या खाद्य सुरक्षा से जुड़े कानून केवल कागजों तक सीमित हैं। आरटीआई से सामने आए नाम और स्थान अब प्रशासन के लिए एक खुली चुनौती हैं—या तो सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई हो, या फिर यह मान लिया जाए कि अवैध कारोबार पर मौन ही सरकारी नीति बन चुका है।
