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सरकारी भवनों की देखभाल से बचेगा करोड़ों का नुकसान, छोटी पहल से सुरक्षित रहेगी जनता की संपत्ति

रिपोर्ट – कबीर

मुजफ्फरनगर। सरकारी भवनों और सार्वजनिक संपत्तियों को सुरक्षित रखने के लिए अब सामूहिक जिम्मेदारी निभाने की जरूरत है। थोड़ी-सी लापरवाही के कारण करोड़ों रुपये की लागत से बने सरकारी कार्यालय, विद्यालय और सार्वजनिक भवन समय से पहले जर्जर होने लगते हैं। वहीं, समय पर सफाई, नियमित निरीक्षण और छोटी-मोटी मरम्मत से इन भवनों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

इस संबंध में अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों से सार्वजनिक संपत्तियों के संरक्षण की अपील की गई है। अपील में कहा गया है कि सरकारी और निजी भवनों की छतों की नियमित सफाई कराई जाए। वर्षा जल की निकासी के लिए बने ड्रेनेज सिस्टम को दुरुस्त रखा जाए, ताकि बारिश का पानी छतों पर जमा न हो। छतों पर उगने वाली घास और पेड़-पौधों को समय रहते हटाया जाए, क्योंकि उनकी जड़ें भवनों में दरार और सीलन का कारण बन सकती हैं।

इसके साथ ही भवनों की दीवारों में दरार, प्लास्टर टूटने, सीलन और पानी के रिसाव जैसी समस्याओं को नजरअंदाज न करने की सलाह दी गई है। समय रहते मरम्मत कराने से न केवल भवनों की उम्र बढ़ेगी, बल्कि भविष्य में होने वाले बड़े आर्थिक खर्च से भी बचा जा सकेगा।

कार्यालयों और सार्वजनिक परिसरों में साफ-सफाई तथा सुव्यवस्था बनाए रखने पर भी जोर दिया गया है। अनुपयोगी सामान, मलबे और टूटे-फूटे उपकरणों का उचित निस्तारण कराया जाए। विद्यालयों और सार्वजनिक भवनों के रखरखाव को विशेष प्राथमिकता देने की बात कही गई है, क्योंकि ये भवन विद्यार्थियों और आमजन के जीवन से सीधे जुड़े हैं।

अपील में कहा गया है कि सरकारी भवन जनता की गाढ़ी कमाई से तैयार होते हैं। इनके निर्माण में बड़ी धनराशि खर्च होती है, इसलिए इनका संरक्षण केवल सरकार या किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि अधिकारियों, कर्मचारियों, जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों का भी सामूहिक दायित्व है।

भवनों का निर्माण जितना जरूरी है, उनका रखरखाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने कार्यस्थल और आसपास की संपत्ति की नियमित देखभाल की जिम्मेदारी निभाए तो सरकारी खजाने पर पड़ने वाले अनावश्यक आर्थिक बोझ को कम किया जा सकता है। छोटी-छोटी सावधानियां देश की अरबों रुपये की सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।

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