रिपोर्टर: कबीर
ब्यूरो रिपोर्ट | मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश
युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले गिरोह पर पुलिस का शिकंजा
मुजफ्फरनगर जिले में पुलिस ने एक ऐसे अंतरजनपदीय गिरोह का पर्दाफाश किया है, जो फर्जी नर्सिंग डिप्लोमा, मार्कशीट और रजिस्ट्रेशन प्रमाण-पत्र तैयार करके बेरोजगार युवाओं को बेच रहा था। यह गिरोह न केवल युवाओं के भविष्य के साथ धोखाधड़ी कर रहा था, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता और आम जनता की सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा बन चुका था।
ककरौली थाना पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई में गिरोह के 10 सदस्यों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने उनके कब्जे से बड़ी मात्रा में फर्जी दस्तावेज, कंप्यूटर उपकरण, प्रिंटर, मोबाइल फोन, लेमिनेशन मशीन और अन्य सामान बरामद किया है। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि गिरोह एक फर्जी नर्सिंग डिप्लोमा को लगभग 25 हजार रुपये में बेचता था।
मुखबिर की सूचना पर शुरू हुई कार्रवाई
पुलिस के अनुसार शनिवार को जटवाड़ा चौकी क्षेत्र में संदिग्ध व्यक्तियों और वाहनों की जांच की जा रही थी। इसी दौरान पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली कि फर्जी डिप्लोमा तैयार कर बेचने वाले कुछ लोग सम्भलहेड़ा जाने वाली नहर पटरी के आसपास मौजूद हैं।
सूचना मिलते ही थाना ककरौली पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए मौके पर दबिश दी और पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ और उनके पास से मिले साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने आगे की जांच शुरू की।
मेरठ तक फैला था फर्जीवाड़े का नेटवर्क
जांच के दौरान पुलिस को इस गिरोह के नेटवर्क की महत्वपूर्ण जानकारी मिली। इसके आधार पर पुलिस टीम ने मेरठ स्थित न्यूटिमा हॉस्पिटल और हिम्स हॉस्पिटल में कार्रवाई करते हुए पांच अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार कर लिया।
पुलिस जांच में यह बात सामने आई कि गिरोह का मुख्य संचालन मेरठ के जानी क्षेत्र में स्थित एक कंप्यूटर सेंटर से किया जा रहा था। यहीं पर फर्जी नर्सिंग डिप्लोमा, मार्कशीट और रजिस्ट्रेशन प्रमाण-पत्र तैयार किए जाते थे।
फर्जी क्यूआर कोड लगाकर बनाए जाते थे दस्तावेज
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक आरोपी दस्तावेजों को असली दिखाने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करते थे। फर्जी प्रमाण-पत्रों पर नकली क्यूआर कोड भी लगाए जाते थे ताकि पहली नजर में दस्तावेज पूरी तरह वास्तविक प्रतीत हों।
गिरोह के सदस्य विभिन्न लोगों का डाटा एकत्रित करते थे और उसी आधार पर प्रमाण-पत्र तैयार किए जाते थे। इस तरीके से तैयार किए गए दस्तावेजों को नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं को बेचा जाता था।
पूछताछ में हुआ बड़ा खुलासा
गिरफ्तार आरोपी कुलदीप कुमार ने पूछताछ में कई महत्वपूर्ण जानकारियां पुलिस को दी हैं। उसने बताया कि वह पिछले लगभग डेढ़ वर्ष से फर्जी दस्तावेज तैयार करने का काम कर रहा था।
उसके अनुसार इस्माईल और आदिल नामक आरोपी उसे आवश्यक डाटा और फर्जी क्यूआर कोड उपलब्ध कराते थे। इसके बदले उसे प्रत्येक दस्तावेज तैयार करने पर लगभग 500 रुपये का भुगतान किया जाता था।
आगे की जांच में यह भी सामने आया कि इस्माईल और आदिल तैयार दस्तावेजों को शिवानंद और मनीष नामक आरोपियों को करीब 4 हजार रुपये प्रति दस्तावेज में बेचते थे। इसके बाद शिवानंद और मनीष इन्हें बेरोजगार युवाओं और नौकरी की तलाश कर रहे लोगों को लगभग 25 हजार रुपये प्रति दस्तावेज के हिसाब से बेचकर भारी मुनाफा कमाते थे।
भारी मात्रा में सामान बरामद
पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से बड़ी मात्रा में आपत्तिजनक सामग्री बरामद की है। बरामद सामान में 17 फाइलों में रखे फर्जी डिप्लोमा और मार्कशीट, 11 फाइलों में आईडी कार्ड और फोटो पेपर, दो सीपीयू, दो मॉनिटर, हार्ड डिस्क, प्रिंटर, लेमिनेशन मशीन, स्टेप्लर, 10 मोबाइल फोन और एक स्प्लेंडर मोटरसाइकिल शामिल हैं।
पुलिस का मानना है कि बरामद सामग्री के आधार पर गिरोह लंबे समय से इस अवैध कारोबार में सक्रिय था और बड़ी संख्या में लोगों तक फर्जी दस्तावेज पहुंचा चुका हो सकता है।
स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए था बड़ा खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला केवल दस्तावेजी धोखाधड़ी तक सीमित नहीं है। यदि फर्जी नर्सिंग डिप्लोमा प्राप्त करने वाले लोग अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में नौकरी हासिल कर लेते, तो मरीजों की जान खतरे में पड़ सकती थी।
स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रशिक्षित और योग्य कर्मियों की आवश्यकता होती है। ऐसे में बिना प्रशिक्षण और बिना मान्यता प्राप्त डिग्री वाले लोगों का अस्पतालों में कार्य करना गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।
इसी कारण पुलिस की यह कार्रवाई जनसुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
पुलिस टीम को मिला सम्मान
इस सफल कार्रवाई का नेतृत्व थाना ककरौली के थानाध्यक्ष जोगिन्दर सिंह ने किया। पुलिस टीम की तत्परता और उत्कृष्ट कार्यशैली की वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने सराहना की है।
वरिष्ठ अधिकारियों ने पूरी टीम को प्रोत्साहित करने के लिए 25 हजार रुपये के नकद पुरस्कार की घोषणा भी की है। इससे पुलिसकर्मियों का मनोबल बढ़ेगा और भविष्य में भी ऐसे अपराधों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करने में मदद मिलेगी।
नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की तलाश जारी
पुलिस अब इस फर्जीवाड़े से जुड़े अन्य व्यक्तियों की पहचान करने में जुटी हुई है। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि अब तक कितने लोगों ने इन फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया और किन संस्थानों में इनके आधार पर नौकरी प्राप्त करने की कोशिश की गई।
अधिकारियों का कहना है कि आर्थिक लेनदेन, बैंक खातों और डिजिटल रिकॉर्ड की भी जांच की जा रही है ताकि पूरे नेटवर्क का खुलासा किया जा सके।
निष्कर्ष
मुजफ्फरनगर पुलिस द्वारा फर्जी नर्सिंग डिप्लोमा और प्रमाण-पत्र तैयार करने वाले गिरोह का भंडाफोड़ कानून व्यवस्था और जनहित के लिए बड़ी सफलता माना जा रहा है। इस कार्रवाई ने न केवल युवाओं को ठगी का शिकार होने से बचाया है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावित करने वाले एक गंभीर खतरे को भी समय रहते रोक दिया है। पुलिस की जांच जारी है और उम्मीद की जा रही है कि आने वाले दिनों में इस नेटवर्क से जुड़े और भी बड़े खुलासे सामने आ सकते हैं।
ब्यूरो रिपोर्ट: कबीर
