ब्यूरो: कबीर
मुजफ्फरनगर। जानसठ रेंज में आंधी के दौरान गिरे सैकड़ों कीमती पेड़ों की लकड़ी के कथित गबन और अवैध बिक्री को लेकर गंभीर आरोप सामने आने के बाद वन विभाग में हड़कंप मच गया है। शिकायतकर्ता ने वन कर्मियों पर लकड़ी माफियाओं से मिलीभगत कर सरकारी संपत्ति को ठिकाने लगाने और बड़े पैमाने पर आर्थिक अनियमितता करने का आरोप लगाया है। मामले की शिकायत उच्च अधिकारियों तक पहुंचने के बाद जांच शुरू कर दी गई है।
आंधी में गिरे थे सैकड़ों पेड़
जानकारी के अनुसार 13 और 14 मई की रात आई तेज आंधी में रामराज क्षेत्र के खादर इलाके में बड़ी संख्या में शीशम समेत कई बहुमूल्य पेड़ गिर गए थे। क्षेत्र में बिजली व्यवस्था भी कई दिनों तक प्रभावित रही थी।
आरोप है कि प्राकृतिक आपदा के बाद गिरे हुए पेड़ों की लकड़ी को सुरक्षित रखने के बजाय कुछ लोगों ने कथित रूप से उसका दुरुपयोग किया और बड़ी मात्रा में लकड़ी को बाजार में बेच दिया।
शिकायत के बाद शुरू हुई जांच
ग्राम सिखरेड़ा निवासी जोगेंद्र सिंह ने मामले की शिकायत उच्च वन अधिकारियों से की। शिकायत में आरोप लगाया गया कि सरकारी लकड़ी का पूरा हिसाब रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया गया और डिपो में सीमित मात्रा में ही लकड़ी जमा दिखाई गई।
शिकायत के बाद मामले की जांच के आदेश दिए गए, जिसके बाद विभागीय स्तर पर हलचल तेज हो गई।
जांच टीम के रवैये पर भी सवाल
शनिवार को जांच टीम के मौके पर पहुंचने के दौरान भी विवाद की स्थिति सामने आई। शिकायतकर्ता का आरोप है कि जांच के दौरान मीडिया की मौजूदगी पर आपत्ति जताई गई और कुछ अधिकारियों ने अपना परिचय देने से भी परहेज किया।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
जड़ों को ढकने का भी आरोप
शिकायतकर्ता का दावा है कि कई स्थानों पर गिरे हुए पेड़ों के अवशेषों और जड़ों को मिट्टी एवं घास से ढकने का प्रयास किया गया, ताकि वास्तविक संख्या छिपाई जा सके। उन्होंने जांच टीम को ऐसे कई स्थान दिखाने का भी दावा किया है।
विभागीय अधिकारियों की प्रतिक्रिया
मामले में संबंधित रेंज अधिकारियों से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी। वहीं, Abhinav Raj ने बताया कि पूरे प्रकरण की जांच कराई जा रही है और जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
कई सवालों के जवाब बाकी
इस मामले में अब कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े हो रहे हैं—
- आंधी में वास्तव में कितने पेड़ गिरे थे?
- कितनी लकड़ी विभागीय डिपो में जमा कराई गई?
- क्या लकड़ी की बिक्री में कोई अनियमितता हुई?
- क्या रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति में अंतर है?
- जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
फिलहाल जांच जारी है। आरोपों की पुष्टि या खंडन जांच रिपोर्ट आने के बाद ही हो सकेगा। लेकिन इस पूरे प्रकरण ने वन विभाग की कार्यप्रणाली और सरकारी संपत्ति की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
