रिपोर्ट – शशिकांत शर्मा शुभम
सिवनीमालवा। नगर मे दशहरा पर्व से छोटे छोटे बच्चो द्वारा टेसू और छोटी छोटी बालिकाओ द्वारा घर घर जाकर टेसू के लिए छल्ला बोली का दान और घरवा के लिए दान मांगते है। यह टेसू और घरवा दशहरा से शरद पूर्णिमा तक चलता रहता है। छोटे छोटे बच्चे पुस्टे के छोटे से तिकोना घर बनाकर उसे पन्नियो से सजाकर उसके अंदर एक दिया और आटे का डरावना पुतला बनाकर रखते है। घर घर जाकर टेसू के गीत मेरा टेसू यही खड़ा खाने को मांगता दही बड़ा, टेसू अच्छा होता तो बहू लाते बहू अच्छी होती तो ऊंट पर बैठाते जैसे गीत गाकर छल्ला बोली का दान और बालिकाये घरवा जो एक मिट्टी के छोटे घड़े मे चारो तरफ छेद करके उसके अंदर दीपक रखकर गीत सिंगाजी घरवा गाजो जी माय थारे घर मुरली बाजे जैसे आशीर्वाद के गीत गाकर दान मांगती है। यहां यह उत्सव टेसू और घरवा के रूप मे मनाया जाता है। शरद पूर्णिमा के दिन टेसू को लकड़ियों से पीट पीट कर नष्ट कर दिया जाता है दान मे मिली राशि को टेसू बनाने वाले बच्चे दाल बाटी चूरमा बनाकर उसका आनंद लेते है। वही बालिकाएं भी घरवा के मिट्टी के कलश को नदी मे प्रवाहित कर देती है और दान राशि से भोजन बनवाकर आनंद उठाती है। सभी ने अपने बचपन में इस उत्सव को अपने मित्रों के साथ मनाया है। विजयादशमी के दिन हम एक लकड़ी का पुतला बनाते थे. उसका चेहरा थोड़ा डरावना रखते थे. उसे पुराने कपडे पहनाकर, उसके मुंह में बीड़ी फसाकर, सर पर जलता हुआ दीपक रख देते थे. विजयादशमी से शरद-पूर्णिमा तक, छ: दिनों तक, शाम के समय मोहल्ले में घर-घर जाकर, उसे सामने खड़ा करके, गीत गाते थे और हर घर से, गेहूं, चावल, अरहर की दाल, शुद्ध घी या कुछ नगद पैसे, जिसको जो देते बने, ले आते थे, कुछ लोग तो कुछ भी नही देते थे, और भगा देते थे। शरद-पूर्णिमा की शाम को अंतिम दिन, सभी घर जाकर, तत्पश्चात उस पुतले याने टेसू.. को, लाठियों से पीटकर, तोड़ देते थे, तथा आग लगाकर, जला देते थे। इकट्ठा किया हुआ, सामान व पैसों से, सारे सदस्य दाल-बाटी, चूरमा बनाकर, खाते है। अलग अलग जगह टेसू की अलग अलग कहानिया और परम्पराये है। ब्रज में एक वक्त था जब दशहरे पर रावण दहन से ज्यादा टेसू और सांझी को घर लाकर उनका विवाह कराने की बच्चों में होड़ ज्यादा रहती थी। बच्चे हाथो में टेसू लेकर घर- घर जाकर टेसू के प्रचलित गीत गाते थे। इसके बाद हर घर उन्हें अनाज या धन देकर विदा करता था। उसे बच्चे टेसू और सांझी के विवाह में लगाते थे। आखिरी में पूर्णिमा के दिन धूमधाम से उनका विसर्जन किया जाता था। धीरे-धीरे ब्रज की ये अनोखी प्रथा अब गुमनाम होती जा रही है। कुछ ही जगहों पर अब टेसू दिखाई देता है।
ब्रज में आज भी कुछ जगहों पर ये प्रथा जिंदा है। शारदीय नवरात्र में बच्चे ‘मेरा टेसू झंई अड़ा, खाने को मांगे दही बड़ा’ ये गीत गाते हैं। लड़के टेसू (इंसान जैसी आकृति वाला खिलौना) लेकर घर-घर घूमते हैं। टेसू के गीत गाकर पैसे भी मांगते हैं। पूर्णिमा के दिन टेसू तथा सांझी का विवाह रचाया जाता है। सांझी और टेसू का खेल ज्यादातर उत्तर भारत में लोकप्रिय हैं। इसे बच्चे ही नहीं, बल्कि युवा भी खेलते हैं। सांझी बनाते समय लड़कियां जो गीत गाती हैं, वो वहीं की भाषा में होते हैं। आमतौर पर टेसू का स्टैंड बांस का बनाया जाता है। इसमें मिट्टी की तीन पुतलियां फिट कर दी जाती हैं, जो क्रमश: टेसू राजा, दासी और चौकीदार की होती हैं या टेसू राजा और दो दासियां होती हैं। बीच में मोमबत्ती या दिया रखने की जगह बनाई जाती है।
लुप्त होती जा रही है प्रथा______
टेसू खेलने की प्रथा अब धीरे-धीरे कम होती जा रही है। इसी वजह से इसे खेलते समय गाए जाने वाले गीत भी किसी को ठीक से याद नहीं हैं। टेसू का खेल दशहरे से शुरू होता है। यूं तो टेसू की धूम सारे उत्तर भारत में रहती थी लेकिन ब्रज, बुंदेलखण्ड और ग्वालियर में टेसू खास तौर पर प्रसिद्ध है। दशहरे के दिन से ही ये गीत गाया जाने लगता है। वो गीत गाते हुए लड़कों की टोलियां गली-मोहल्लों मे हाथ में टेसू और बालिकाएं घरवा लिए घूमती-फिरती हैं।
