रिपोर्टर: कबीर
मुजफ्फरनगर। वर्ष 1994 के चर्चित रामपुर तिराहा प्रकरण से जुड़े कथित फर्जी हथियार बरामदगी मामले में विशेष सीबीआई अदालत ने तीन पूर्व पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराते हुए विभिन्न धाराओं में सजा सुनाई है। अदालत के आदेश के अनुसार सभी सजाएं एक साथ चलेंगी, जिसके चलते दोषियों को अधिकतम 18 माह (डेढ़ वर्ष) का साधारण कारावास भुगतना होगा।
विशेष सीबीआई अदालत ने सुनाया फैसला
विशेष न्यायाधीश (सीबीआई) डॉ. डी.के. फौजदार की अदालत ने तत्कालीन एसएचओ बृजकिशोर, कांस्टेबल उमेश चंद और अनिल कुमार को आपराधिक षड्यंत्र, फर्जी अभिलेख तैयार करने, अवैध हथियार बरामदगी दर्शाने और मिथ्या आरोप लगाने से संबंधित मामलों में दोषी करार दिया।
विभिन्न धाराओं में सुनाई गई सजा
अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी, 218, 211, 182 तथा आयुध अधिनियम की धारा 25 के तहत अलग-अलग अवधि के साधारण कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई।
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी सजाएं एक साथ (Concurrent) चलेंगी। इसलिए दोषियों को सबसे अधिक अवधि वाली डेढ़ वर्ष (18 माह) की सजा ही भुगतनी होगी।
उम्र और स्वास्थ्य को मिली राहत
सजा पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि तीनों दोषी अब बुजुर्ग हो चुके हैं, लंबे समय से न्यायिक प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं तथा विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से भी पीड़ित हैं। साथ ही उनका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।
इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने कठोर कारावास के स्थान पर साधारण कारावास की सजा सुनाई।
32 साल पुराने मामले में न्यायिक फैसला
यह मामला वर्ष 1994 के रामपुर तिराहा गोलीकांड के बाद आंदोलनकारियों के खिलाफ कथित फर्जी हथियार बरामदगी दिखाए जाने के आरोपों से जुड़ा था। मामले की जांच सीबीआई ने की थी और करीब 32 वर्षों तक न्यायिक प्रक्रिया चलने के बाद अब इस पर फैसला आया है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय रामपुर तिराहा प्रकरण से जुड़े लंबे समय से लंबित मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक पड़ाव माना जा रहा है।
