रिपोर्ट – कबीर

मुज़फ्फरनगर। भारत की सामाजिक संरचना में सदियों तक नारी को सीमाओं में बांधकर रखा गया। उसे निर्णय लेने के अधिकार से दूर रखा गया और उसकी भूमिका को केवल घर की चौखट तक सीमित कर दिया गया। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। नया भारत न केवल महिलाओं को पहचान दे रहा है, बल्कि उन्हें नेतृत्व की मुख्यधारा में भी ला रहा है। इस परिवर्तन की सबसे मजबूत कड़ी बनकर उभरा है नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023, जिसने महिलाओं के अधिकार और भागीदारी को एक नया आयाम दिया है।
यह अधिनियम केवल एक कानून नहीं, बल्कि महिलाओं के सम्मान और सशक्तिकरण का ऐतिहासिक संकल्प है। इसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित किया गया है, जो आने वाले समय में देश की राजनीति और नीति-निर्माण की दिशा बदलने का सामर्थ्य रखता है।
अगर आज के भारत पर नजर डालें तो बदलाव साफ दिखाई देता है। पंचायती राज संस्थाओं में आज 46 प्रतिशत महिलाएं नेतृत्व की भूमिका निभा रही हैं। 1957 में जहां लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी महज 3 प्रतिशत थी, वहीं 2024 तक यह बढ़कर करीब 15 प्रतिशत तक पहुंच गई है। महिला सांसदों की संख्या 22 से बढ़कर 75 हो चुकी है, जबकि राज्यों में यह आंकड़ा 15 से बढ़कर 42 तक जा पहुंचा है। देशभर में करीब 14.5 लाख महिला प्रतिनिधि पंचायतों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
सिर्फ राजनीति ही नहीं, बल्कि शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र में भी महिलाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं। STEM यानी विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित के क्षेत्र में 43 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी इस बदलाव की गवाही दे रही है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 72 प्रतिशत घर महिलाओं के नाम किए गए हैं, जिससे उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। मुद्रा योजना में लगभग 69 प्रतिशत ऋण महिलाओं को दिए गए, जबकि स्टैंड-अप इंडिया योजना में 84 प्रतिशत लाभार्थी महिलाएं हैं।
महिलाओं के जीवन को आसान बनाने के लिए सरकार की योजनाओं का प्रभाव भी साफ दिख रहा है। उज्ज्वला योजना के तहत 10 करोड़ से अधिक गैस कनेक्शन दिए गए हैं, जिससे महिलाओं को धुएं से मुक्ति मिली है। वहीं जल जीवन मिशन के माध्यम से 14.45 करोड़ ग्रामीण परिवारों तक पानी पहुंचाया गया है। स्वच्छ भारत मिशन के बाद 93 प्रतिशत महिलाओं ने माना कि अब उन्हें पहले जैसी कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी सुधार दर्ज किया गया है। मातृ मृत्यु दर, जो 2014-16 में 130 प्रति लाख थी, वह घटकर 2021-23 में 88 प्रति लाख रह गई है। करोड़ों गर्भवती महिलाओं की जांच की गई और मातृत्व अवकाश को 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दिया गया, जिससे महिलाओं को बेहतर देखभाल और सुरक्षा मिल सकी।
हालांकि, इन उपलब्धियों के बावजूद चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। महिलाओं द्वारा किया जाने वाला बिना वेतन का घरेलू कार्य देश की जीडीपी में लगभग 40 प्रतिशत योगदान देता है, लेकिन उसे वह पहचान और सम्मान नहीं मिल पाता जिसकी वह हकदार है। मतदान में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी जरूर है, लेकिन निर्णय लेने वाली मेज पर उनकी वास्तविक हिस्सेदारी अब भी सीमित है।
ग्रामीण भारत की हकीकत आज भी यही है कि कई जगहों पर महिला प्रधान तो चुनी जाती है, लेकिन वास्तविक सत्ता उसके पति या परिवार के हाथ में होती है। कई महिलाओं की पहचान आज भी उनके नाम से नहीं, बल्कि उनके पति के नाम से जुड़ी होती है। लोकतंत्र में मतदान का अधिकार सबसे बड़ा अधिकार माना जाता है, लेकिन आज भी अनेक महिलाएं अपने मन से वोट नहीं डाल पातीं और परिवार के दबाव में निर्णय लेती हैं।
यही सच्चाई इस बात को और मजबूत करती है कि नारी सशक्तिकरण केवल कागजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि जमीनी स्तर पर भी नजर आना चाहिए। महिलाओं को केवल अधिकार देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन अधिकारों का स्वतंत्र रूप से उपयोग करने की आजादी भी सुनिश्चित करनी होगी।
साथ ही, उन वीरांगनाओं को भी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। आज भी कई शहीदों की पत्नियां रोजगार और सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष कर रही हैं। यह स्थिति समाज के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा करती है—क्या हम सच में हर नारी को उसका अधिकार दे पा रहे हैं?
नारी शक्ति वंदन अधिनियम इस दिशा में एक बड़ा कदम है। यह केवल 33 प्रतिशत आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में इसे 50 प्रतिशत तक ले जाने का मार्ग भी प्रशस्त करता है। जब संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ेगी, तो फैसले भी अधिक संवेदनशील, संतुलित और समावेशी होंगे।
अब समय आ गया है कि हम नारी को केवल सम्मान देने की बात न करें, बल्कि उसे समान अधिकार और वास्तविक भागीदारी भी दें। समाज के हर निर्णय में महिलाओं की बराबरी की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।
क्योंकि सच यही है—
जब नारी सशक्त होती है, तभी समाज समृद्ध होता है…
और जब समाज समृद्ध होता है, तभी राष्ट्र सशक्त बनता है।

